भोपाल,31 जनवरी। अयोध्या में राम मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के साथ ही चित्रकूट में एक अभिनव प्रयोग की शुरुआत हुई है। यहां के जनजातीय बच्चों को संस्कारवान बनाने मधुरिमा संस्कार पाठशाला स्थापित की गई है। बच्चों को सनातनी संस्कार के साथ जीवन मूल्यों का भी पाठ पढ़ाया जाएगा।
सतना जिले के चित्रकूट के बगैर भगवान राम की चर्चा अधूरी है क्योंकि भगवान राम ने अपने 14 वर्ष के वनवास काल का अधिकांश समय लगभग 12 वर्ष इसी क्षेत्र के जंगलों में बिताया था। आज भी यहां के लोगों के मन में राम का बसेरा है । अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के बाद से इस इलाके में भी उत्सव जैसा माहौल है। इस क्षेत्र के दूरस्थ इलाकों की जनजातीय बाहुल्य बस्तियों के बच्चे भी राम जैसा बने और उनके आदर्श को अपने जीवन का हिस्सा बनाएं इस दिशा में प्रयास शुरू हो गए है।
मधुरिमा सेवा संस्कार फाउंडेशन ने चित्रकूट विधानसभा क्षेत्र के बटोही गांव में मधुरिमा संस्कार पाठशाला शुरू की है। यह जनजाति बाहुल्य बस्ती है। इस पाठशाला के शिक्षक बच्चों को स्वच्छता का पाठ पढ़ा रहे हैं, साथ ही उन्हें अपनी दिनचर्या में माता- पिता का किस तरह सम्मान करना चाहिए ,यह भी बताया जा रहा है। इन बच्चों को खेल-खेल में नैतिक शिक्षा का पाठ पढ़ने की भी योजना बनाई गई है। भगवान राम, कृष्ण के अलावा स्वामी विवेकानंद, पंडित दीनदयाल उपाध्याय और महात्मा गांधी के जीवन को भी यह बच्चे जाने इसका भी पाठ पढ़ाया जाएगा।
मधुरिमा सेवा संस्कार फाउंडेशन की संस्थापिका डॉ स्वप्ना वर्मा का कहना है कि 500 साल के संघर्ष के बाद राम जी अयोध्या आए हैं और हमारा संकल्प है कि नई पीढ़ी भी राम के आदर्शों को अपनाये, इसीलिए जनजाति बाहुल्य की बस्ती में संस्कार पाठशाला शुरू की गई है। बच्चों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इच्छा के अनुरूप स्वच्छता का पढ़ाया जा रहा है तो वही महापुरुषों के जीवन से भी बच्चों को अवगत कराया जाएगा ताकि वे उस मार्ग पर आगे बढ़ें।
बटोही वह गांव है जहां की गोलकी बाई ने व्यक्तिगत श्रम से एक बांध बनाया और इस बात का जिक्र प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी मन की बात कार्यक्रम में किया था। अब इसी गांव से बच्चों को संस्कारवान बनाने के लिए पाठशाला शुरू हुई है ,जिसमें वर्तमान में लगभग 40 बच्चे आ रहे हैं जो 3 साल से 10 साल तक के हैं। इनमें अधिकांश वे बच्चे हैं जो विद्यालय कम जाते हैं, उनके माता-पिता वनोपज इकट्ठा करने जंगलों में चले जाते हैं और बच्चे पूरा दिन सड़कों पर खेलते रहते हैं। यह बच्चे खेल- खेल में संस्कार भी सीखे इस मकसद को लेकर शुरू हुई पाठशाला में आने वाले बच्चे भी आनंदित हो रहे हैं। यह अपने तरह का नया प्रयोग है।
